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सोमवार, 16 नवंबर 2009

'आमने-सामने' में इस बार यश मालवीय

सफ़र के अनियमित श्रृंखला आमने-सामने में इस दफ़ा यश मालवीय अपने कुछ गीत सुनाएंगे और फिर प्रख्‍यात कवयित्री अनामिका के सानिध्‍य में श्रोता उनसे सीधी बातचीत करेंगे.
सफ़र द्वारा पिछले साल आरंभ किया गया यह कार्यक्रम सचमूच नायाब है, इसलिए कि इसके तहत कोई भी रचनाकार न केवल समय‍ निकाल कर फूर्सत से अपनी पसंदीदा रचनाएं सुनाते हैं बल्कि लोगों को उनसे उनकी रचनाओं के साथ-साथ उनके रचना कर्म समेत जीवन के विभिन्‍न पहलुओं पर भी बातचीत करने का मौक़ा होता है. कोशिश यह है कि इसके ज़रिए लोग उनकी रचनाओं के मार्फ़त उन्हें जानें ही, पर उससे भी आगे बढकर उनके व्‍यक्तित्‍व और व्‍यवहार को भी जानें. सफ़र को यह ख़ुशी है कि इस श्रृंखला की शुरुआत समकालीन पसंदीदा रचनाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव जी द्वारा लघुकथाओं और उनकी कुछ चुनी हुई कविताओं के पाठ के साथ हुआ था और साथ में थीं अर्चना वर्मा. वज़ीराबाद की संकरी गलियों से गुज़र कर राजेंद्रजी, अर्चना जी और उनको जानने-सुनने के इच्‍छूक चालीस-पैंतालीस लोग सफ़र के दफ्तर में इकट्ठा हुए थे. उसी सफलता से प्रेरित हो कर सफर ने इस बार अपने ज़माने के पसंदीदा नवगीत लेखक तथा लोकप्रिय कवि श्री यश मालवीयजी को आमंत्रित किया है. यश मालवीय ने उदयप्रकाश के उपन्‍यास पर आधारित फिल्‍म 'मोहनदास' के लिए बड़े सुंदर गीत लिखे हैं. मेरे खयाल से अपने जमाने में शायद ही कोई कवि या गीतकार होंगे जो अका‍दमियों या सभागारों से बाहर जाकर कविता पाठ करते होंगे, यश भाई उस लिहाज़ से बहुत बड़े अपवाद हैं. इलाहाबाद में लगने वाला माघ मेला का पंडाल हो, या दिल्‍ली में अंबेडकर जयंती पर सामुदायिक पार्क में खुले आसमान के नीचे होने वाले कार्यक्रम: उनके गीत लोगों को थम कर सुनने को मजबूर करती रही हैं.
उम्‍मीद है दिल्‍ली में रहने वाले साहित्‍यप्रेमी और सृजनशील लोग इस मौक़े का लाभ ज़रूर उठाएंगे.

2ND MEDIA WORKSHOP

1-3 December2009, Seminar Room, CSDS, Delhi-110054

Media is every body’s cup of tea today and at the same time it has become a hot cake which attracts a sizable number of youth as a glamorous carrier. This is why every second day a new media institute/course is coming into being. These media institutes are promising a sure and lucrative journalistic career and charging heavy fees from students. On the other hand universities and colleges have started teaching media in the name of employment oriented course. The private media institutes aim to prepare an army of media walkers and managers while the govt. institutions are teaching media to make ideals. Those who study in colleges/universities may be acquainted with theory but lack practical skills, especially the use of new technology; whereas students coming from private institutions are trained to become pawns of market and the corporate world only.

The question of social commitment remains far behind in both the situations. While the fact is that when media loses social concern and neglects the issue of social development and transformation, it becomes meaningless. And this kind of ‘media’ can be management, can be a lucrative profession or anything else but not media. Therefore, This is the high time to look at the media scenario, and include all those socially relevant issues which will help the students and media-personals in developing a social approach, so that they could think and work towards a better and just society.

It is not always necessary to start with a big capital and heavy paraphernalia in terms of machinery. In fact, many a times it forbids genuine initiatives and creates havoc in the process of learning. Now, several examples have been set all over the world, where a meager technological assistance has boosted the proliferation process of alternative media. The pertinent thing is how open your eyes are, how you see your everyday life and what is your understanding of the space and time, you are a part of.

The media programme of SAFAR constantly searching and exploring opportunities to establish an alternative media, a media which will go beyond the academic barriers and market preconditions. It also intends to do experimental media activities of different kinds, especially low cost media with not only prevalent forms and technologies but also with emerging ones.

In order to honor its commitment towards real media, SAFAR in association with SARAi-CSDS is organizing a three day Media Workshop for students, media enthusiasts, development professionals and grassroot activists; which is the second in the series. This will include bi-lingual sessions on print, radio, television, and web journalism by experts like Khadeeja Arif (correspondent , BBC Radio), Piya Kochhar (Radio Journalist & Media Entrepreneur), Prof. Abhay Kumar Dubey (CSDS), Dilip Mandal (economicstimes.com), Rahul Pandita (Senior Corrspondent, Open), Rakesh Kumar Singh (Digi-activist & media researcher), Shailesh Bharatwasi (hindyugm.com) and Vineet Kumar (TV Critic).

Since SAFAR is a self funded initiative, we are charging a meager amount of Rs. 600/- from students, Rs. 900 from development professionals and Rs. 1200 from corporate professinals , which will include registration & course fee, lunch, tea and stationeries.

Outstation participants should manage their stay at their own. Participants would be given certificates.

Last date of registration is November 20th 2009. No request will be entertained after that. For registration please click the link below:

http://docs.google.com/View?id=dddnkgvk_6ckjwqfcf


David
Bhawna

शुक्रवार, 16 नवंबर 2007

विकल्प: दस दिवसीय शिविर में आपका स्वागत है

सफ़र उत्तर बिहार के शिवहर जिले में एक दस दिवसीय शिविर, विकल्प का आयोजन कर रहा है. 22 से 31 दिसंबर 2001 तक तरियानी छपरा गांव में चलने वाले इस शिविर का मुख्‍य उद्देश्य है सम्प्रेषण के विविध उपकरणों और तौर-तरिक़ों से दोस्ती गांठना और समुदाय के हित में उनके प्रयोग की बारिकियों को सीखना. शिविर इस मायने में महत्तवपूर्ण है कि सहभागियों को आपस में अपने ज्ञान और हूनर के आदान-प्रदान का मौक़ा मिलेगा और साथ में ग्रामीण जीवन का तजुर्बा भी. उम्मीद है यह शिविर मनचाही दिशा में आगे बढ़ने में सहभागियों की मदद करेगा.

कोशिश की गयी है कि विकल्प सीखने-सिखाने का एक दिलचस्प माध्‍यम बने. इन दिनों के दौरान सहभागी नयी मीडिया तकनीकों के साथ तरह-तरह के प्रयोग करेंगे, ग्रामीणों के साथ बातचीत करेंगे, तस्वीरें उतारेंगे और विडीयो बनाएंगे, आवाज़ और तस्वीरों के साथ कुछ खेल करेंगे, किताब डिज़ाइन करेंगे, कॉमिक बनाएंगे, कहानी और कविता लिखेंगे ...

कुछ सामुदायिक बैठकें भी होंगी जहां शिविरार्थियों को रहन-सहन, कला, संस्‍कृति इत्यादि से रू-ब-रू होने का अवसर मिलेगा.

विकल्प मे शामिल होने के लिए किसी तरह की औपचारिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है, हां, समुदाय और मीडिया में दिलचस्पी तो होनी ही चाहिए. शिविर में शामिल होने का मन बना रहे लोगों से हमारा यह अनुरोध है कि वे तरियानी छपरा आने-जाने का ख़र्च ख़ुद वहन करें साथ ही 500 रुपए का अनुदान भी दें ताकि खान-पान और टिकने-टिकाने के अलावा अन्य ज़रूरी सामग्री का इंतजाम किया जा सके. आप यदि अतिरिक्त अनुदान देना चाहें तो आपका स्वागत है. ये अतिरिक्त योगदान किसी और सहभागी के काम आ सकता है.

सफ़र एक लाभनिरपेक्ष पहल है. कार्यक्रम और गतिविधियों के अनुरूप दोस्तों, शुभचिंतकों और अपने हमसफ़रों का सहयोग हमारा वित्तीय आधार है.

विकल्प में आपका स्वागत है. आप इस न्यौते को खुलकर अपने दोस्तों और परिचितों के साथ साझा कर सकते हैं. शिविर में शामिल होने का मन बना रहे हों तो जल्द से जल्द हमें सू‍चित करें.

तरियानी छपरा मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे जंक्शन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मुज़फ़्फ़रपुर के लिए देश के लगभग सभी बड़े शहरों से सीधी रेल की व्यवस्था है.

किसी भी तरह की पूछताछ के लिए

safar.delhi@gmil.ocm पर लिखें, या
+91 9811 972 872 अथवा +91 9971 393 818 पर फ़ोन करें

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2007

बगिया

बीते नवंबर में सफ़र द्वारा बाल दिवस पर चलाए गए अभियान की रिपोर्ट

फर बच्चों की रचनात्मकता और सृजनशीलता के प्रोत्साहन के लिए कृतसंकल्प है। विगत सात महीनों के दौरान सफर दिल्ली सरकार आवासीय परिसर तिमारपुर और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ विविध तरह की रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय है। इसी शृंखला की अगली कड़ी के तौर पर 14 नवंबर ‘बाल दिवस’ के मौक़े पर एक पंद्रह दिवसीय बाल-अभियान का संचालन किया गया।

पाँच नवंबर को इलाक़े के बच्चों ने स्थानीय मनोरंजन कक्ष में ए बैठक आयोजित की जिसमें 10 से 14 साल के पैंसठ बच्चों ने हिस्सा लिया, और यह तय किया कि बाल दिवस के अवसर पर कार्यक्रम किया जाए। उन्होंने यह बताया कि उनके लिए थिएटर, कहानी, कवित लेखन, चित्राकला इत्यादि पर रोचक कार्यशालाओं का आयोजन किया जाए।

12 नवंबर को बच्चों ने इलाक़े में प्रभात पेफरी निकाली। इसके बाद लगभग 30 बच्चों का एक दल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में चल रहे इंडियन सोशल फोरम देखने गया। देश-विदेश में विभिन्न ांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों के जल, जंग, ज़मीन, पहचान समेत तमाम क़िस्म के मानवाधिकार आंदोलनों से वे रू-ब-रू हुए। बच्चें ने वहाँ एक रैली भी निकाली और दिल्ली में जारी सीलिंग की समस्या पर अपना नाटक 'बापू के तीनों बंदर' भी दिखाए।

19 नवंबर को 'बगिया: बाल उत्सव' रूप में इस अभियान का समापन हुआ। दिल्ली सरकार आवासीय परिसर के मुख्य पार्क में आयोजित इस कार्यक्रम में बच्चों ने 'खेल-खेल में', 'बापू के तीन बंदर', 'ानी रे पानी' तथा 'किस्सा कूड़े का' नामक नाटक के माध्यम से क्रमश: लिंगभेद, सीलिंग, जल और साफ-सफाई की समस्याओं की स्थानीय लोगों का ध्यान आकर्षित किया। दिलचस्प बात है कि ये चारों ही नाटक कार्यशालों के दरम्यान बच्चों ने ख़ुद ही तैयार किए थे। संवाद और निर्देशन भी उन्हीं का था। सफर के कार्यकर्ताओं ने मात्र ज़रूरत के समय उनकी सहायता की और उनके लिए अन्य सहयोग जुटाए. नाटकों के अलावा बच्चों ने रोज़मर्रा से जुड़े सरोकारों पर आधरित गीत और नृत्य भी प्रस्तुत किए।

बगिया की शुरुआत सुबह 11 बजे मनोरंजन कक्ष में आयोजित चित्रकारी कार्यशाला से हुई। बच्चों ने अपने दैनंदिन जीवन के अनुभवों को रंग और ब्रश के माध्यम से अभिव्यक्त किया। दोपहर ए बजे बच्चों ने सामूहिक भोज किया, जिसमें अपने-अपने घरों से लाए लज़ीज़ भोजन को उन्होंने आपस में बाँटकर खाया। भोजन के तुरंत बाद बच्चों ने राज्य द्वारा खड़ी की गयी सीमाओं पर बच्चों की प्रतिक्रिया पर आधारित बिनोद गनतारा की फिल्म 'हेडा-होडा' देखी और उस पर चर्चा की। बातचीत के दौरान बच्चों ने कहा कि ये फिल्म उनके माता-पिता को भी दिखायी जानी चाहिए। उसके बाद 'पर्यावरण और हम' विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की गयी जिसमें 'वी फॉर यमुना' नामक एक संस्था के श्री विमलेन्दु झा ने फेसिलिटेटर की भूमिका अदा की। उन्होंने बड़े ही रोचक और दिलचस्प तरीक़े से पर्यावरण के विभिन्न रंगों पर बातचीत की और गाने भी गाए।

मुख्य कार्यक्रम का आगाज़ शाम साढ़े चार बजे से कॉलोनी के मेन पार्क में 'जिगरी' नामक बैंड के गायन से हुआ। जिगरी ने अडम गोंडवी, फैज़, दुष्यंत कुमार की कुछ नज्मों के अलावा विभिन्न आंदोलनों के गीत पेश किए। इसके बाद बच्चों ने मंच की बागडोर अपने हाथों में थामी।

कार्यक्रम के औपचारिक समापन से पूर्व गुरू गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में क़ानून के प्राधयापक श्री अनुज वक्ष, दिल्ली स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत सुश्री जस्सी मैथ्यु, दिल्ली मिल्क स्कीम में असिस्टेंट मैनेजर श्री अमल कुमार सेन, सामाजिक कार्यकर्ता श्री शशिमोहन तथा गृहणी सुश्री अनीता ने बच्चों के बीच पुरस्कार वितरित किया।

सफ़र के दिल्ली संयोजक श्री गौतम जयप्रकाश ने बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए वातावरण तैयार करने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज परीक्षा में अधिक से अधिक अंक लाने के दवाब तले बच्चे इस क़दर पिस रहे हैं कि उन्हें अपनी सृजनात्मकता का एहसास भी नहीं हो पाता है। माता-पिता महानगर की आपाधापी में बच्चों की ज़रूरत का धयान नहीं रख पाते हैं। बच्चों की रचनात्मकता और सृजनशीलता को उचित अवसर प्रदान करना सफ़र का एक प्रमुख लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि सफ़र की हरसंभव कोशिश होगी कि बच्चों के स्वस्थ विकास और स्कूली सबक के बोझ से हटकर उनकी सृजनशीलता को प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें मंच प्रदान किया जाए। 'बगिया' का आयोजन इस दिशा में एक महत्तवपूर्ण क़दम है।

दर्शकों तथा प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए सफ़र लीगल सेल की संयोजिका एडवोकेट चंद्रा निगम ने 'वी फॉर यमुना' तथा 'डीए फ़्लैट्स रेजिडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन' को कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कॉलोनी की महिलाओं से ख़ास तौर पर यह अपील की कि बच्चों के सपनों की दुनिया को साकार करने में वे बच्चों का साथ दें। बिन्नी, आकृति तथा रुचि ने कार्यक्रम का संचालन किया। राजन शर्मा, आदित्यनाथ, नरेश गोस्वामी, अविनाश कुमार, भावना, रजनीश कुमार, शिशुपाल सिंह, सोनू, चंचल, संगीता तथा अशोक कुमार के सक्रिय योगदान ने भी कार्यक्रम के सफल सन्चालन में अहम भूमिका निभायी।

प्रस्तुति: भावना



गुरुवार, 27 सितंबर 2007

कमलेश्वर और हिन्दी में मीडिया लेखन: एक गोष्ठी

नयी कहानी पहली पंक्ति के अग्रणी लेखक तथा मीडिया लेखन में दमदार भूमिका अदा करने वाल साहित्यकार स्वर्गीय की स्मृति में सफ़र की ओर से विगत 18 फ़रवरी को तिमारपुर में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक श्री प्रभात रंजन और इतिहासकार एवं लेखक तथा 'दीवान-ए-सराय' श्री रविकान्त ने साहित्य के सामान्तर जनसंचार माध्यमों के लिए लेखन में एक समान दख़ल रखने वाले कमलेश्वर के लेखकीय जीवन के दोनों पहलुओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की थी. पेश है उसकी एक संक्षिप्त रपट:

प्रभात रंजन के मुताबिक़ कमलेश्वर ऐसे वक़्त में दूरदर्शन से जुड़े जब भारत में टेलीविज़न की पहुंच सीमित थी. उस दौर के तमाम साहित्यकार रेडियो के लिए काम में रुतबा महसूस करते थे और टीवी के लिए काम करना दोयम दर्जे का समझा जाता था. तब कौन जानता था कि आज के लगभग दस हज़ार करोड़ के मीडिया साम्राज्य का सिरमौर दूरदर्शन ही बनने वाला है. पॉप्युलर मीडिया के कार्यक्रम, भले ही ज्यादा देखे जाने वाले एकता कपूर की धारावाहिकें ही क्यों न हो, हममें से कितने लोग उनके पटकथा लेखकों को जानते हैं, परंतु चन्द्रकांता जैसे मेगा हिट धारावाहिक हो या मौसम, आंधी, अमानुष, सौतन, हरजाई, गृहप्रवेश, आदि फिल्में – पटकथा लेखक कमलेश्वर को कभी पहचान का संकट नहीं रहा. कमलेश्वर तथा मनोहर श्याम जोशी हिन्दी के ऐसे जाने-माने साहित्यकार हैं जिन्होंने ये साबित कर दिया जनसंचार माध्यमों में भी रचनात्मका की गुंजाइश है, जबकि प्रेमचंद जैसे मूर्धन्य साहित्यकार ने सिनेमा जगत को सृजनात्मकता के लिए दमघोंटू माहौल करार दिया था. मीडियाकर्मी-साहित्यकार के आयामों को समेटे हुए कमलेश्वर ने अगर कितने पाकिस्तान जैसा चित्रात्मक धटनाप्रधान उपन्यास लिखा है तो वहीं डाकबंगला, रेगिस्तान कृतियों के ज़रिए भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया है. मीडिया में सफ़ल कमलेश्वर का सामाजिक सरोकार भी उतना ही उल्लेखनीय रहा है. उन्होंने 1984 में कानपुर में चार बहनों की सामूहिक आत्महत्या की विषयवस्तु पर आधारित व़त्तचित्र की पटकथा भी तैयार की. प्रभात रंजन के मुताबिक कमलेश्वर ने केवल टेलीविज़न या रेडियो के लिए ही नहीं लिखा, बल्कि अख़बारी लेखन में भी उनकी धाक लम्बे समय तक कायम रहेगी. और तो और उन्होंने छोटे-छोटे शहरों और दूर-दराज के गांवों में जबरदस्त पहुंच बना लेने वाले ‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ जैसे अख़बारों के शुरुआती संपादक की भूमिका भी निभायी. एक ठेठ राजस्थानी तेवर लिए तो दूसरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बोलियोंं में सना हुआ.

रविकान्त ने कहा कि कमलेश्वर भाषा के मामले में बेहद उदार थे. गंगा-जमुनी तहज़ीब कमलेश्वर के लेखन की बड़ी विशेषता थी. उन्होंने कहा, ‘कुछ भी नया करने के लिए बने-बनाए खांचों और वैचारिक दड़बों को तोड़ना पड़ता है और कमलेश्वर ने यह काम बख़ूबी किया.’ आज अंग्रेज़ी के मुक़ाबले हिन्दी में तकनीकी शब्दों की कमी है, और ऐसे में हमें हिन्दी-उर्दू के मिले-जुले शब्द भंडार को इस्तेमाल करने से नहीं हिचकना चाहिए. इससे हमारा शब्द भंडार और समृद्ध होगा. रविकान्त के अनुसार हिन्दी उर्दू के अल्फ़ाजों का जमकर इस्तेमाल करने वाले कमलेश्वर कॉपीराइट का भी जमकर विरोध करते हैं. कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम के बीच जिन्दगीनामा को लेकर हुआ विवाद हो या ऐसा ही कोई और प्रसंग, उन्होंने भाषा की राजनीतिक लड़ाई खड़ा करने वालों की जमकर खिंचाई की.

कमलेश्वर ऐसे महत्वाकांक्षी लेखक थे जिन्होंने जिस भी विधा में हाथ आज़माया उसको पूरी लगन और तन्मयता के साथ अंजाम तक पहुंचाया और कामयाबी हासिल की. उन्होंने हिन्दीभाषी लेखक के उस दुराग्रह को भी तोड़ा कि व्यावसायिक और कला सिनेमा के साथ रचनात्मक संतुलन नहीं कायम किया जा सकता है. वस्तुत: मनोहर श्याम जोशी और कमलेश्वर के निधन से हिन्दी जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है. आज मीडिया लेखन के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए मीडिया संस्थानों में रचनात्मक लेखन को लेकर कोई पहल नहीं की जा रही है, और इस लिहाज़ से कमलेश्वर की कमी और खलती है जो न केवल संवेदनशील रचनाकार थे बल्कि अपने आप में एक संस्थान भी.

डीए फ़्लैट्स के निवासियों के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी इस परिचर्चा में भागीदारी की.

सोमवार, 24 सितंबर 2007

'सफ़र' और 'माटी' की प्रस्तुति: स्वयम्

21 सितम्बर, अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के अवसर पर नयी दिल्ली में एक पांच दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. ‘कृति’ के तत्वाधान में आयोजित इ कार्यक्रम में कई सामाजिक एवं स्वैच्छिक भाग ले रही हैं.

भारत पर्यावास केन्द्र (इंडिया हैविटेट सेंटर), लोधी रोड स्थित पाम कोर्ट में चल रहे रहे इस कार्यक्रम में शांति-संदेशों से लैस पोस्टर औ फ़ोटो प्रदर्शनियों के अलावा विभिन्‍न सामाजिक मसलों पर कार्यरत् संस्थाओं द्वारा उनके कामों से संबंधित कामों की जानकारी से युक्त स्टॉल्स भी लगाए गए हैं.

‘सफ़र’ ने इस कार्यक्रम में अपनी सहयोगी संस्था ‘माटी’ के साथ मिलकर पे किया 'स्वयम्', मिथकीय प्रसंग महिषासुर मर्दिनी की पुनर्व्याख्‍या.

मिथकों में कहा गया है कि दुर्गा की उत्पत्ति आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिए हुई थी. महिषासुर नामक दानवों के राजा को कई वर्षों की तपस्या के बाद ब्रह्मा ने वरदा दिया था कि कोई भी देवता या मानव (नर) उसका वध नहीं कर पाएगा. इस वरदान के घमंड में इतना चूर हो गया कि वह पूरी दुनिया पर शासन करने का ख़्वाब देखने लगा, और पूरी दुनिया को आतंकित करना शुर कर दिया. तीनों लोकों में भय और दहशत का माहौल पैदा हो गया. देवता भी उससे मुक़ाबला करने में असफल रहे. आखिरकार उन्होंने त्रिदे यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास जाकर महिषासुर के आतंक से आज़ाद कराने की विनती की. कोई स्त्री ही उसका संहार कर सकती थी यह जानकर तीनों देवताओं ने अपनी उर्जा से देवी यानी दुर्गा का सृजन किया, और उसे अस्त्र-शस्त्र से लैस किया. रूद्र ने अपना त्रिशुल, विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र, ब्रह्मा ने अपना कमंडल और इंद्र ने वज्र आदि हथियारों से देवी को सुसज्जित किया. और फिर संग्राम में सामने आने पर दुर्गा ने त्रिशुल से महिषासुर का सीना भेदकर तीनों लोकों को असुरों के आतंक से मुक्त कराया.

आधुनिक युग में भी स्त्रियों को तरह-तरह की आसुरी शक्तियों का मुक़ाबला करना करना पर रहा है. हर क्षेत्र में स्त्रियां असुरक्षित हैं. घर-परिवार, या समाज या फिर कार्यस्थल : शोषण जारी है. छेड़खानी, बलात्कार, तेज़ाब से हमला, दहेज़-हत्या, या फिर गर्भ में मादा भ्रूण हत्याएं ... फ़ेहरिस्त अंतहीन है.

अत: महिलाओं को ही फिर से इस राक्षस का अंत करना होगा. आज की स्त्रियां बेहद उर्जावान है, आत्म-सम्मान, शिक्षा, चेतना तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता से लैस हैं, असुरों का बध करने में सक्षम हैं और ये सिद्ध कर सकते हैं कि वो अदि-शक्ति दुर्गा की वंशज हैं.

शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

कांशीराम और उत्तर भारत में दलित आन्दोलन: एक गोष्ठी

सफ़र ने विगत 5 नवंबर 2006 को तिमारपुर स्थित दिल्ली डमिनिस्ट्रेशन कॉलोनी मेंकांशीराम और उत्तर भारत में दलित आंदोलन' विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया था. पेश है उसकी एक संक्षिप्त रपट:

सीएसडीएस में वरिष्ठ फ़ेलो श्री आदित्य निगम ने बातचीत की शुरुआत करते हुए कहा कि उत्तर भारत के राजनीतिक पटल पर कांशीराम के सामने तमाम कद्दावर नेता या हस्ती बौनी पड़ जाती है. डॉ आम्बेडकर के बाद 1980 से कांशीराम ने दलित सियासत को नया मोड़ दिया. उन्होंने आम्बेडकर का ज्यों का त्यों अनुसरण करने के बजाय उनकी उपलब्धियों और ग़लतियों, दोनो से सबक़ लिया. वे मौक़े तथा वक्त के हिसाब से नीतियां बनाने में माहिर थे. बहुजन समाज पार्टी के तहत मनु विरोधी दलित तथा पिछड़ों को संगठित करना सिर्फ उनके बूते की ही बात हो सकती थी. समाज के शोषित तबक़े के सामाजिक एवं राजनीकि उत्थान के लक्ष्य के बावजूद उन्होंने कभी भी दलित हितों के साथ समझौतावादी रवैया अख्तियार नहीं किया. इसी बिंदु पर बसपा समाजवादी पार्टी से स्वयं को अलग करती है. पहली बार 1993 में मायावती के सत्तारोहण के शिल्पकार कांशीराम ने दलित तबक़े को यह अहसास कराया कि वे भी राजनीति की कमान थाम सकते हैं. राजनीति के खेल में अल्पसंख्यक माने जाने वाले दलित अब ताल ठों कर कह सकते थे कि वे भी सत्ता के सिंहासन पर क़ाबिज़ होने का दम-ख़म रखते हैं. कांशीराम के आन्दोलन के फलस्वरूप दलितों में बड़े पैमाने पर राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ.

विगत दशकों में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ होने के साथ चूंकि उच्च तथा सवर्ण वर्ग का पलायन शहारों की तरफ़ हुआ है, इसलिए अब गांवों में मुख्य रूप से दलित तथा पिछड़े वर्गों के बीच संघर्ष होने लगे हैं. आदित्य ने कांशीराम के बारे में मीडिया या समाज के एक हिस्से द्वारा अवसरवादी राजनीति करने का आरोप का खंडन करते हुए कहा कि कांशीराम का कहना था कि दलितों को तो अब तक अवसर ही नहीं मिला है, दलितों को अपनी राजनीति‍क और सामाजिक तरक़्क़ी के लिए जो भी अवसर मिले उसका इस्तेमाल ज़रूर करना चाहिए. कांशीराम की नीतियों की सराहना करते हुए श्री निगम ने कहा कि यदि वे उन अवसरों का इस्तेमाल नहीं करते जो उन्होंने उत्तर प्रदेश में किया तो आज बहुजन समाज पार्टी ताक़त नहीं होती. उनके मुताबिक़ कांशी राम बेहद ही सुलझे द्रष्टा थे. हिन्दुस्तान की सियासत में उनकी सोशल इंजीनियरिंग का कोई जोड़ नहीं है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी श्री सतेन्द्र कुमार ने भी आदित्य की बात का समर्थन करते हुए 1993-94 को दलित राजनीति के लिए अहम दौर बताया क्योंकि पहली बार दलित और पिछड़ों को अपनी मजबूत राजनीतिक-सामाजिक हैसियत का अंदाज़ा हुआ. आम तौर पर भारतीय ग्राम जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे, फलां गांव जाटों का है, फलां यादवों का तो फलां जाटवों का. प्रशासनिक काम-काज के लिए सवर्ण नेताओं, ग्राम सेवकों के सामने उन्हें हाथ जोड़ने पड़ते थे. सामुदायिक भवनों में, जलसों-बैठकों तक में उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता था. मगर 1993 के बाद से परिदृश्य तेज़ी से बदला है. दलितों के पास मायावती, कांशीराम जैसे सफल राजनीतिज्ञ मौजूद थे. अब वे भी पार्टी का परचम लहरा सकते थे, बैनर टांग सकते थे. उन्हें सरकारी काम-काज के लिए दलित स्वयंसेवकों और नेताओं की जमात हासिल होने लगी. दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं की दशा में भी सुधार हुआ. अब मतदान के प्रति उनका भी रुझान बढ़ा, क्योंकि उनके पास अब कांग्रेस और भाजपा के बरअक्स एक विकल्प मौजूद था.

गोष्ठी में डीए फ़्लैट्स रेसिडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन के श्री बिशनचंद्र, श्री बाबुलाल रमण तथा श्री रणवीर सिंह, सफ़र के शोध संयोजक श्री नरेश गोस्वामी, लीगल सेल की संयाजिका सुश्री चंद्रा निगम, मीडिया संयोजिका सुश्री भावना था विस्तार संयोजक श्री आदित्यना‍थ के अलावा बीबीसी हिन्दी सेवा से जुड़े पत्रकार श्री स्वदेश कुमार तथा डॉ. भीमराव आम्बेडकर कॉलेज की छात्रा सुश्री चंचल ने भी अपने विचार व्यक्त किए. गोष्ठी में आसपड़ोस के लोगों के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी हिस्सा लिया.

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सफ़र दिल्ली के संयोजक श्री गौतमजयप्रकाश ने कहा कि संस्था विगत आठ-दस महीनों से विभिन्न मसलोंपर इस इलाक़े में काम कर रही है. संस्था की यह कोशिश है किसामाजिक-सांस्कृतिक मसलों परहोने वाली गोष्ठियां केवलविश्वविद्यालयों, शोध- संस्थानों तथामंडी हाउस या कला दीर्घाओं केआसपास तक ही सिमट कर रहजाएं. इसी सोच के साथ सफ़र इलाक़ोंऔर गली-मोहल्लों में सामाजिकसरोकारों से जुड़े मसलों पर चर्चा, वाद-विवाद, गोष्ठी, इत्यादि कार्यक्रमोंका आयोजन कर रहा है और आगे भीकरता रहेगा.

बुधवार, 12 सितंबर 2007

सूचना का अधिकार शिविर


बीते शनिवार 8 सितंबर 2007 सफ़र, दिल्ली ने सतर्क नागरिक संगठन (एसएनएस) के साथ मिल कर तिमारपुर स्थित दिल्ली सरकार आवासीय परिसर में एक 'सूचना का अधिकार' शिविर का आयोजन किया. एसएनएस की ओर से अंजलि भारतद्वाज, अमृता तथा अशोक भाई ने स्थानीय नागरिकों को सूचना के अधिकार क़ानून के बारे में बताया और विभिन्न सरकारी महकमें से संबंधित उनके सवालों पर आवेदन बनाने में उनकी सहायता की. शिविर में पीडब्ल्यूडी तथा हॉर्टिकल्चर विभाग के लिए कई आवेदन पत्र तैयार किए गए. स्थानीय रेजिडेंट्स वेलफ़ेयर संगठन के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी शिविर में शिरकत की. नीतू, चंचल, संचिता, राजीव, और रजनीश के अलावा सफ़र की मीडिया संयोजक भावना तथा लीगल सेल की संयोजक चंद्रा निगम ने शिविर के आयोजन में महत्वूर्ण भूमिका निभाई.