रविवार, 24 फ़रवरी 2008

बाबा फूले टोला में सरस्वती पूजा

'विकल्प' शिविर के बाद तरियानी छपरा में संस्था के काम में बेहिसाब तेज़ी आयी है. अब लोगों के लिए सफ़र अजूबा नहीं रह गया है. ख़ासकर उन टोलों में जहां पिछले दिसंबर में विकल्प के शिविर्रार्थियों ने समय बिताया था, काम की रफ़्तार और दिशा औरों से भिन्न है.
सफ़र, तरियानी छपरा के साथी हर हफ़्ते बताते हैं कि कैसे बाबा फूले टोला में शिक्षाघरों की गतिविधियां ज़्यादा तेज़ हो रही हैं, कैसे समुदाय के लोग स्वयं आकर सीखने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं. किताबघर सही मायने में अब फंक्शनल हो रहा है. पढ़ने-लिखने वाले बच्चे अपने अनपढ बुजुर्गों को गोल दायरे में बिठाकर किताबों से कहानियां सुनाते हैं. 14-15 साल की लड़कियां जो तब बहुत लजा-शर्मा रही थीं, अब हिचक त्याग कर नरेश भाई के शिक्षाघर में आ रही हैं. नरेश भाई स्कूल में अध्यापकी करने के बाद शिक्षाघर में अपना योगदान दे रहे हैं. दिलीप और शंकर भाई अपनी तमाम व्यस्ताओं के बाद भी नियमित रूप से समय निकाल रहे हैं शिक्षाघर के लिए. एक ही टोले में तीन अलग-अलग स्थानों पर शिक्षाघर चल रहा है.
उधर धानुकटोली में विकास भाई और उनके साथी शिक्षाघर का संचालन कर रहे हैं. उनके टोले के बड़े-बुजुर्गों का पूरा साथ मिल रहा है उन्हें. पिछली मतर्बा फ़ोन पर विकास भाई और अभय भाई ने बताया था कि उन लोगों ने सफ़रनामा अख़बार का दूसरा अंक 26 जनवरी के मौक़े पर निकाला था जिसमें छोटे-छोटे बच्चों ने रिपोर्टर की भूमिका निभायी थी. कह सकते हैं जागरूकता अभियान का पहला दौर अब चालू हुआ है.
आज ही विकास ने बताया कि उनका मैट्रिक का इंतहान 25 मार्च से शुरू हो रहा है. इसलिए इन दिनों उन्होंने शिक्षाघर का काम स्थगित कर दिया है. हां, सुबह साढे चार बजे वे लोग हाई स्कूल के मैदान में फुटबॉल खेलने ज़रूर जाते हैं. गांव के कई और नौजवान भी फुटबॉल खेलने पहुंच जाते हैं सुबह-सुबह. खेल के मैदान में ही सफ़र की चर्चा होती है और इंतहान के बाद क्या-क्या किया जाएगा, योजनाएं बन रही हैं.
बड़ा उत्साह बढता है ये सब सुनकर. लगता है कि अगर शुरुआत की जाए तो देर भले ही हो, पर लोग जुड़ते ज़रूर हैं. लोगों में बदलाव की इच्छा है और वे इसके लिए काम करना चाहते हैं. चार-पांच दिन पहले रानी बहन ने बताया कि पहली बार बाबा फूले टोला के लोगों ने मिलकर सरस्वती पूजा का आयोजन किया. यह समाचार सुखद है, क्योंकि मौजूदा ग्रामीण व्यवस्था में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. विकल्प के दौरान स्थानीय लोगों के साथ बातचीत का बड़ा फ़ायदा हुआ है. शिविरार्थियों ने कुछ भी तो नहीं किया सिवाय स्थानीय मसलों पर लोगों के साथ बातचीत के अलावा. बातचीत में बस यही जानने की कोशिश की गयी कि आखिर क्यों उन्होंने अपनी स्थिति को प्राकृतिक मान लिया है. मान लिया है कि उनका जीवन पीसने के लिए ही है, उनके जीवन में सदैव 'बड़े' लोगों का सेवा ही क्यों लिखा है. शायद यही वो सवाल थे जिसने लोगों की चेतना को एक हद तक जागृत किया. रानी ने बड़े खुश होकर बताया, 'भाइजी, ओई दिन बड़ा फोन मिलइली, बा‍किर न मिललक फोन. एंह, बड़ा निम्न लगइत रहई. समुच्चा टोला के लोग दू-दू रुपइया लगाके पूजा कएलक. जय-जय हो गेल.' निश्चित रूप से ये उनकी जागृति का असर है. अब अपनी बदहाली या खुशहाली को समझने के लिए किसी शिविरार्थी की मदद नहीं होगी. हां, इस विश्वास को पुख्ता करने के लिए अभी और प्रयास किए जाने हैं. सफ़र के लिए ये एक बड़ी चुनौती है.

रविवार, 27 जनवरी 2008

बाबा फूले टोला: नया प्रतीक नयी पहचान

22 से 31 दिसंबर 2007 के बीच तरियानी छपरा में संपन्न हुए सामुदायिक मीडिया शिविर 'विकल्प' पर अपने तजुर्बे की दूसरी खेप बांट रहे हैं विनीतजी
..... इन हालातों के बीच सफर और मीडिया वर्कशॉप के लिए बनी टीम विकल्प तरियानी छपरा के लोगों के बीच पहुंचती है। साथ में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हमारे साथी। गांव के कई लोग हमारे साथ ऐसे थे जो अपने ही गांव के कुछ इलाकों में पहली बार हमारे साथ जा रहे थे। जो साथी बाहर से आए थे उनका साफ कहना था कि हमारे यहां भी बेकारी है, गरीबी है, नागपुर में भी पिछड़पन है लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि लगे ही नहीं कि देश अभी तक आजाद नहीं हुआ है। मेरे लिए तो जातिगत आधार पर गांव के टोलों का विभाजन, नामकरण और अंदर की व्यवस्था का देखना पहली बार हो रहा था। आपको साफ झलक जाएगा कि फलां टोली अगड़ी जातियों का है और फलां पिछड़ी जातियों का। अगड़ी जातियों की जो टोली थी वो गांव के ठीक बीचोबीच में और जैसे-जैसे जाति का विभाजन नीचे के स्तर तक पहुंचता उनकी टोलियां गांव के केन्द्र से उतनी ही नीचे खिसकती चली जाती है. इसलिए कभी चमड़े का काम करने वाले लोगों (अब तो दिल्ली, लुधियाना, कलतकत्ता, डिमापुर कमाते हैं) की टोली एकदम नीचे, गांव से बहिष्कृत और पूरे गांव की गंदगी और नाली के पानी का जमावड़ा। ऐसा नहीं है कि उनके टोले में जो गंदगी है उसके लिए सिर्फ वे ही जिम्मेवार हैं बल्कि ढलान से सारा पानी उनके टोले में आकर जमा हो जाता है। एक और बात जिस पर हमारा ध्यान गया वो यह कि टोले का नामकरण भी उनके जातिगत पहचान और उनकी हैसियत से जुड़ा है। अगड़ी जातियों के टोले का नाम सीधे-सीधे उनकी जाति को संबोधित करके नहीं है। राजपूतों के लिए ‘अठघरवा’, बिचला पट्टी, ‘अलोरा’, ‘बाबा टोला’ जैसे नाम हैं जबकि पिछड़ी जातियों के नाम सीधे-सीधे उनकी जाति पर आधारित है जिसका नाम वहां के स्थानीय लोग बड़े ही हिकारत से लेते हैं, जैसे 'चमरटोली', 'मुसहरी', '' इत्यादि। उनकी तरह उनके नाम और उनका टोला भी अछूत करार दे दिया गया है और गांव के तथाकथित सभ्य लोग उधर कभी नहीं जाते। ऐसे हरेक टोलों से दुनिया भर की किंवदंतियां जोड़ दी गयी हैं और सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि सारी बुराईयों के जड़ यही सारे टोले हैं।

सफर की टीम ने सबसे पहले इनके बीच की हीनता- बोध को ध्वस्त करने का काम किया। ठीक है, तुम्हारा जन्म अगड़ी जाति में नहीं हुआ इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि तुम्हारे आदमी होने की गारंटी खत्म हो गई और तुम्हें इंसान की तरह जीने का हक नहीं है। अगर जाति से लोगों को महान होना होता तब तो तुम्हारे गांव में उंची जाति के लोगों में दुनिया की सारी समझदारी आ जाती, जबकि ऐसा नहीं है। तुम्हें अपनी स्थिति में सुधार जाति के पचड़ों में पड़कर नहीं बल्कि अपने अधिकारों को जानने, सरकार की ओर से तुम्हारे लिए जो सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं उसे समझने में होगी। अपने साथी चंद्रा ने जो कि पेशे से एडवोकेट है, लोगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर बातचीत की, उन्हें बताया कि कैसे अपने अधिकारों के बारे में जानने से उनकी स्थिति में सुधार होगा और अगड़ी जातियों का तुम्हारे उपर जो शोषण है वो खत्म होगा। इसके लिए सबसे जरुरी है सालों से एहसास कराए जाने वाली उस मानसिकता से उपर उठने की कि तुम नीची जाति के हो। तुम गांव के निवासी होने के साथ ही देश के नागरिक हो और जिसका की अपना संविधान है जो इस बात की गारंटी देता है कि तुम किसी भी मामले में कम नहीं। विकल्प की टीम ने गांव के उस टोले का नाम बदल दिया. बाबा फूले टोला नाम दिया उसका. न केवल नये प्रतीक को जन्म दिया बल्कि एक खास तरह की पहचान गढने की कोशिश की. आज उस टोले के किसी भी व्यक्ति से पूछा जाए वो अपने टोले का नाम बाबा फूले टोला ही बताता है. बच्चा, बूढ़ा, औरत मर्द. गजब का परिवर्तन.

साथ की रेहाना बहन जो कि गुजरात से आयी थीं और जॉय भाई जो दिल्ली से आए थे, ने टोले की महिलाओं से लगातार सात दिनों तक बातचीत की, उन्हें बताया कि नहीं फढ़ने-लिखने से कितना नुकसान होता है, कैसे बच्चे गंदगी में भटकते फिरते हैं और महिलाएं खुद पुरुषों के आगे किस तरह लाचार हैं। आप पढ़-लिखकर आगे के लिए सोच सकती हैं। शुरु-शुरु में तो महिलाएं घर से निकलती तक नहीं थीं लेकिन बाद में वे हमसे खुलती चली गयीं। और उसके बाद जो आत्मीय संबंध बने सो आने तक एक दारुण विदाई की शक्ल मे बदल गए।

टोले के अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते. नहीं जाने की अलग-अलग वजहें थी जिसमें स्कूल के मास्टरों का उदासीन रवैया और भेदभाव भी शामिल था। सात-आठ दिनों में हम उन्हें कोई मुकम्मल पढ़ाई नहीं दे सकते थे। लेकिन इतना हमने करने की जरुर कोशिश की कि पढ़ाई के प्रति उनमें रुचि पैदा हो. क्योंकि हम लोगों ने पाया कि बच्चे दिमागी स्तर पर कमजोर नहीं हैं, अधिकांश बच्चे हमारी बातों को बड़ी जल्द ही समझ लेते हैं लेकिन यही बात वे स्कूल में या पढ़ाई के स्तर पर नहीं कर पाते। सो सबसे ज्यादा जरुरी है कि उन्हें अलग-अलग तरीकों से पढ़ाई के प्रति ललक पैदा की जाए। अक्षर ज्ञान भी लोगों को कम ही था, अधिकांश लोग पढ़ नहीं पाते। ऐसे में जरुरी था कि उनके बीच गीत, चित्र और छोटे-छोटे खेलों से बात शुरु की जाए ...

शुरुआत की हमने गीतों के माध्यम से, खेलों से। क्योंकि सबसे ज्यादा जरुरी था कि बच्चे पहले हमसे बातचीत करने की स्थिति में आएं। उनके साथ मिलकर रोज कुछ न कुछ रोचक गतिविधि चलाई जाती थी. ध्‍यान रखा जाता था कि गतिविधि ऐसी हो जिसमें ज्यादा से ज्यादा बच्चे शामिल हो सकें, उन्हे करने के लिए कुछ सोचना नहीं पड़े। मसलन लोक गीत, चोर-सिपाही, बूझो कौन जैसे खेल। एक दिन की बात तो कभी भूलने की नहीं है-

हमलोगों ने उन्हीं बच्चों में से एक को गांव का मुखिया बना दिया, बाकी बच्चों को उसके सामने बिठाया और कहा कि आप लोगों को इस गांव में जो भी परेशानी महसूस होती है, मुखियाजी को बताओ और साथ में यह भी बताओ कि कैसे सुधार किया जा सकता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि सात साल के बच्चे से लेकर बारह साल के इन बच्चों के पास अपनी अलग-अलग समस्याएं थीं और अपने-अपने विज़न भी। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं मिला जो कि गांव को लेकर कुछ भी न बोल पाया हो। और मजा तो तब आया जब मुखिया बने बच्चे ने उन सारे बच्चों से वायदा किया कि ये तो खेल-खेल में हो गया लेकिन हमलोग सचमुच में जाकर मुखियाजी क सामने अपनी बात रखेंगे।

दूसरे नजारे पर गौर कीजिए। हमने कहा कि आज तुमलोगों में से हर किसी को कुछ न कुछ गाकर सुनाना है, कुछ एक्टिंग करनी है। पहले तो उनमें थोड़ा संकोच रहा लेकिन एक बार जब शुरु हुए तो गाते चले गए। कुछ बच्चों के गाने को सुनकर मुझे तो अफसोस होने लगा- हाय रे ए टीवी चैनलवालों, टैलेंट हंट में ये बच्चे इन्हें कभी हाथ नहीं लगते! जबरदस्त अभाव, लाचारी और गंदगी के बीच इन बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को देखकर कोई भी मोहित हुए बिना नहीं रह सकता! असल में ये गुदड़ी के लाल हैं!



....क्रमशः

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

सामुदायिक मीडिया शिविर विकल्प: एक हैरतंगेज़ तजुर्बा


22 से 31 दिसंबर 2007 के बीच तरियानी छपरा में संपन्न हुए सामुदायिक मीडिया शिविर 'विकल्प' के दौरान जो कुछ भी देखने-समझने को मिला, विनीतजी ने उस पर लिखना शुरू किया है. इसे रपट भी समझा जा सकता है.
पेश है उनके तजुर्बे की पहली किस्त:


देश की आजादी के साठ साल बाद भी कई ऐसे गांव हैं जहां पानी, बिजली, सड़क तो क्या लोगों को रहने के लिए झोपड़ी तक नसीब नहीं है और न ही खाने के लिए अनाज। विकास के बड़े-बड़े नमूनों, महानगरों की चमचमाते शॉपिंग मॉलों और चौड़ी काली सड़को से गुज़रते हुए जब आप इन गांवों में पहुंचेंगे तो आपके मन में एक ही सवाल उठेगा कि क्या ये भारत का ही हिस्सा है और दूसरा बड़ा सवाल कि क्या यहां लोग रहते हैं. लेकिन सच तो यही है कि ये सारे बदनसीब इलाके भारत का ही हिस्सा और यहां लोग रहते भी हैं। लेकिन कैसे ...

यही सब कुछ जानने-समझने के लिए सफ़र ने दिसंबर 2007 के अंत में दस दिन का सामुदायिक मीडिया शिविर ‘विकल्प’ का आयोजान किया. 22-31 दिसंबर के बीच शिवहर जिले के तरियानी छपरा गांव में संपन्न हुए इस शिविर का मुख्य उद्देश्य था मीडिया के विभिन्न माध्यमों का प्रयोग करते हुए वहां की स्थितयों को समझना और उसे देश के सामने लाना साथ ही इलाक़ाई स्तर पर मीडिया या जनसंचार के वैसे माध्‍यमों को खड़ा करना जिसमें कोई लागत न आए और अगर आए भी तो कम से कम. इस प्रकार सामाजिक जागरुकता का काम शुरू हो जहां लोग आसानी से अपनी बात रख सकें। सूचना के प्रति लोगों की समझ विकसित हो और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हों।

अपने इस सोच को अंजाम देने के लिए सफ़र ने बिहार के सबसे अधिक पिछड़ा कहे जाने वाले तरियानी छपरा को चुना। यह इलाक़ा बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले से क़रीब 35 किलोमीटर दूर है. पता चला कि यह बाढ़ प्रभावित इलाक़ा है और हरेक साल बाढ़ से बेहिसाब तबाही होती रही है। सफ़र ने पूरी वस्तुस्थिति को समझने और अलग-अलग माध्यमों से हालात को सामने लाने के लिए देश के कई स्वयंसेवी संस्थाओं, समाजकर्मियों और समुदाय की बेहतरगी के लिए काम करने वाले लोगों को सूचित किया, उन्हें आमंत्रित किया कि वे इस पिछड़े इलाके में मीडिया को माध्यम बनाते हुए लोगों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों के प्रति समझदारी पैदा करने में उसकी मदद करें। नतीजा वाकई चौंकाने वाला रहा। देस के क़रीब चौदह-पन्‍द्रह राज्यों के लोगों ने सम्पर्क किया और अंततः दिल्ली, गुजरात, बिहार, उत्तरांचल, महाराष्ट्र, झारखंड और बंगाल से लोग दस दिन के इस सामुदायिक मीडिया शिविर में भाग लेने पहुंचे। यह पहल अब सफ़र के टीम की पहल नहीं रह गयी थी बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों की सामुदायिक पहल बन गई. 22 दिसम्बर से 30 दिसम्बर तक ‘विकल्प’ में भाग लेने आए दल के सदस्यों ने तरियानी छपरा, बिहार में वैकल्पिक मीडिया के ज़रिए सामाजिक जागरुकता का काम किया।

गांव की स्थिति और जीने की शैली शहर या कस्बों की जिंदगी से बिल्कुल अलग होती है। विकल्प की टीम में ज्यादातर लोग शहरों से आए थे और तिस पर अहिन्दी प्रदेश के लोगों को भाषा को लेकर कुछ समस्याओं का आना स्वाभाविक था। इसका हल निकाला वहीं के कुछ स्थानीय बच्चों और सफ़र के कार्यकर्ताओं ने। ये वे बच्चे थे जो स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ हिन्दी और थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी भी जानते थे। और एक-एक करके स्थानीय भाषा न समझने वाले लोगों के पीछे लग गए। औऱ इस तरह से दस दिन तक बाहर से आए लोगों को वहां की भाषा सीखाते और समझाते रहे। एक तरह से शिविर का यह नियमित सत्र रहा। औऱ जहां हम काम करें सबसे पहले वहां की भाषा के लिहाज़ से काम करें वाला फ़र्मूला फ़ॉलो किया जाने लगा और इसका पूरा श्रेय वहां के बच्चों को जाता है।

धीरे-धीरे भाषा सीखने के साथ वहां के लोगों के बीच काम करने का सिलसिला शुरू हुआ और विकल्प की टीम लोगों के बीच पहुंती। पहले दिन तो सारे लोग एक साथ पूरे गांव में घूमे, लोगों से बातचीत की और वापस हाई स्कूल स्थित अपने शिविर में आकर एक खांका तैयार किया कि कैसे क्या काम करना है. दूसरे दिन से पांच-पांच की टीम बनाकर अलग-अलग टोले में जाने लगे। वहां मोहल्ले को टोला कहा जाता है. इन टोलों के बंटवारे का आधार जाति है। इन टोलों की स्थिति जाति के हिसाब से तय होती है। और शहर में आकर हमारी ये धारणा टूटने लगी थी कि अब देश में जातीय संरचना टूट रही है, यहां आने पर एक बार फिर अफसोस होता है कि कैसे अभी भी लोग जातीय बंधनों में जकड़े हुए हैं।

दलित और पिछड़े समुदायों के टोलों में कई ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते, कईयों ने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी और छोटे-मोटे काम में लग गए। बाल मज़दूरी है। बच्चे जलावन की लकडियों के लिए दिन-दिन भर भटकते-फिरते हैं। ग्यारह-बारह साल के बच्चे गुजरात और गुडगांव मज़दूरी करने जाने को तैयार हैं, मां-बाप उन्हें पढाना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें इसका कोई सीधा लाभ समझ मे नहीं आता। कुपोषण की वजह से बच्चों में बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। एक तरह से कह लें कि उनसे उनका बचपन छीना जा रहा है।

लड़कियों की हालत बेहद चिंताजनक है। कई टोलों की लड़कियां लिखना-पढ़ना नहीं जानती, कभी स्कूल तक नहीं गई। मां-बाप उन्हें घर के कामों में लगाए रखते हैं। कुछ अभिभावको का मानना है कि सुरक्षा के लिहाज़ से ये इलाक़ा ठीक नहीं है। इनके साथ कुछ हादसा न हो जाए इसलिए इनको बाहर पढ़ने-लिखने नहीं भेजते। कईयों की शादी तो दस-ग्यारह साल में ही कर दी जाती है। यानि बाल-विवाह अब भी जारी है। कम समय में शादी होने और बच्चा पैदा करने के करण कई बार उनकी असमय मौत हो जाती है।

महिलाओं की स्थिति भी गयी-गुजरी है। उन्हें या तो खेतों में काम करना है या फिर घर का चूल्हा-चौका। वे अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानती। सरकार उनके लिए क्या कुछ कर रही है, कुछ नहीं पता। सौ महिलाओं में एक को भी पोषण के लिहाज़ से दुरुस्त खोज पाना मुश्किल है।

पुरुषों का मुख्य काम खेती है। लेकिन कईयों की ज़मीन बाढ़ के कारण या फिर तंगी हालत के कारण नहीं रही, उन्हें मज़दूरी का काम करना पड़ता है। उनका टके-सा जबाब होता है जब खाने के पैसे नहीं हैं तो बाल-बच्चों को कहां से पढाएं।

नौजवानों में अलग ढंग की निराशा है। उनमें व्यवस्था और हालातों को लेकर गहरा असंतोष है लेकिन दिशाहीन होने की स्थिति में कोई आवाज़ उठने नहीं पाती।

इन सबके बीच सामुदायिक संस्थानों जिनके उपर लोगों को बेहतर सेवा देने का जिम्मा है, लचर है और वहां के अधिकांश लोग मनमाने तरीक़े से काम करते हैं। चाहे वो स्कूलों में दोपहर के भोजन का मामला हो या फिर राशन कार्ड पर मिलने वाला सामान। सब जगह अपने ढंग की मनमानी है।

कुल मिलाकर सरकार के बड़े-बड़े वायदों को झुठलाता हुआ एक ऐसा गांव जहां लोगों के बीच सूचना का घोर अभाव है। उन्हें पता ही नहीं कि सरकार या प्रशासन की ओर से उन्हें कौन-सी सुविधाएं दी जा रही है।

इस महौल में विकल्प की टीम पहुंचती है लोगों के बीच काम करने और यह बताने के लिए कि कैसे सूचना को जानने के माध्यम के तौर पर विकसित किए जाएं।

शुक्रवार, 16 नवंबर 2007

विकल्प: दस दिवसीय शिविर में आपका स्वागत है

सफ़र उत्तर बिहार के शिवहर जिले में एक दस दिवसीय शिविर, विकल्प का आयोजन कर रहा है. 22 से 31 दिसंबर 2001 तक तरियानी छपरा गांव में चलने वाले इस शिविर का मुख्‍य उद्देश्य है सम्प्रेषण के विविध उपकरणों और तौर-तरिक़ों से दोस्ती गांठना और समुदाय के हित में उनके प्रयोग की बारिकियों को सीखना. शिविर इस मायने में महत्तवपूर्ण है कि सहभागियों को आपस में अपने ज्ञान और हूनर के आदान-प्रदान का मौक़ा मिलेगा और साथ में ग्रामीण जीवन का तजुर्बा भी. उम्मीद है यह शिविर मनचाही दिशा में आगे बढ़ने में सहभागियों की मदद करेगा.

कोशिश की गयी है कि विकल्प सीखने-सिखाने का एक दिलचस्प माध्‍यम बने. इन दिनों के दौरान सहभागी नयी मीडिया तकनीकों के साथ तरह-तरह के प्रयोग करेंगे, ग्रामीणों के साथ बातचीत करेंगे, तस्वीरें उतारेंगे और विडीयो बनाएंगे, आवाज़ और तस्वीरों के साथ कुछ खेल करेंगे, किताब डिज़ाइन करेंगे, कॉमिक बनाएंगे, कहानी और कविता लिखेंगे ...

कुछ सामुदायिक बैठकें भी होंगी जहां शिविरार्थियों को रहन-सहन, कला, संस्‍कृति इत्यादि से रू-ब-रू होने का अवसर मिलेगा.

विकल्प मे शामिल होने के लिए किसी तरह की औपचारिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है, हां, समुदाय और मीडिया में दिलचस्पी तो होनी ही चाहिए. शिविर में शामिल होने का मन बना रहे लोगों से हमारा यह अनुरोध है कि वे तरियानी छपरा आने-जाने का ख़र्च ख़ुद वहन करें साथ ही 500 रुपए का अनुदान भी दें ताकि खान-पान और टिकने-टिकाने के अलावा अन्य ज़रूरी सामग्री का इंतजाम किया जा सके. आप यदि अतिरिक्त अनुदान देना चाहें तो आपका स्वागत है. ये अतिरिक्त योगदान किसी और सहभागी के काम आ सकता है.

सफ़र एक लाभनिरपेक्ष पहल है. कार्यक्रम और गतिविधियों के अनुरूप दोस्तों, शुभचिंतकों और अपने हमसफ़रों का सहयोग हमारा वित्तीय आधार है.

विकल्प में आपका स्वागत है. आप इस न्यौते को खुलकर अपने दोस्तों और परिचितों के साथ साझा कर सकते हैं. शिविर में शामिल होने का मन बना रहे हों तो जल्द से जल्द हमें सू‍चित करें.

तरियानी छपरा मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे जंक्शन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मुज़फ़्फ़रपुर के लिए देश के लगभग सभी बड़े शहरों से सीधी रेल की व्यवस्था है.

किसी भी तरह की पूछताछ के लिए

safar.delhi@gmil.ocm पर लिखें, या
+91 9811 972 872 अथवा +91 9971 393 818 पर फ़ोन करें

सोमवार, 5 नवंबर 2007

हमारा सामुदायिक घर ताड़ी की गद्दी है ...

रामप्रवेश राम

तरियानी छपरा गांव में कुछ अनुसूचित जाति मोहल्लों में विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सामुदायिक भवन और चौपाल निर्माण करवाया गया है. हमारे टोले में भी कहने के लिए दो सामुदायिक भवन और चौपाल है. सफ़र के कार्यकर्ताओं ने गांव की सार्वजनिक संपत्ति के बारे में जब से दस्तावेज़ीकरण करना शुरू किया है तब से मेरा ध्यान भी इस पर गया है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि पहले मैं इसके बारे में नहीं सोचता था, पर तब मैंने ये नहीं सोचा था कि इस पर भी कुछ लिखा-पढ़ा जा सकता है. लेकिन जब अभय, विजय, विकास और सफ़र के अन्य साथियों ने अपने-अपने ने मोहल्ले और आसपड़ोस के सामुदायिक भवनों पर काम करना शुरू किया तब मैंने भी इस मसले पर विचार करना शुरू किया.

एक सामुदायिक चौपाल हमारे घर के ठीक बग़ल में है. पर कोई भी व्यक्ति देखकर उसे चौपाल नहीं कहेगा. मैं बचपन से इस चौपाल को देख रहा हूं. उपर से खपरैल और नीचे ईंट और सिमेंट की फ़र्श, और ईंट के ही पायों पर खड़ा यह चौपाल दरअसल अब ताड़ी और ताश का अड्डा बनकर रह गया है. दिन ढलते ही यहां ताड़ी पीने वालों का जमघट लग जाता है. ताश खेलने वाले तो ख़ैर, दिन भर लगे ही रहते हैं. वैसे लोग जिन्‍हें काम-धंधे में मन नहीं लगता है, जमे रहते हैं यहां.

टोले का ही एक व्यक्ति ताड़ी का कारोबार करता है. उसने चौपाल को दो तरफ़ से घेर दिया है, जिसमें वह ताड़ी रखता है और उसके मवेशी भी चौपाल के इर्द-गिर्द बंधे रहते हैं. देर रात तक लोग ताड़ी पीकर गाली-गलौज करते हैं और जमकर शोर मचाते हैं. आसपास के लोगों को इसके चलते बहुत परेशानी होती है. कई पियाक तो ऐसे हैं जो घर भी नहीं जाते हैं और रातभर हंगामा मचाते हैं.

कई बार ताड़ी का धंधा करने वाले को समझाने की कोशिश की गयी कि वो ये काम बंद कर दें. समझना तो दूर की बात, वो उल्टे समझाने वालों से झगड़ने लगता है और मारपीट पर उतारू हो जाता है. एक-आध बार मामला थाने में भी पहुंचा, लेकिन कोई ख़ास असर नहीं हुआ. शायद ले-देकर मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया क्योंकि पुराना काम जारी ही रहा.

दूसरा सामुदायिक भवन जो थोड़ी दूर हटकर सड़क के किनारे है, उसकी हालत और भी जर्जर है. छप्पड़ भी टूट गया है. अब यह भवन शौचालय से ज़्यादा कुछ नहीं रह गया है. मैंने जब इसके बारे में अपने आसपास के लोगों से बातचीत की तो उनका कहना था कि कौन जाएगा उससे झगड़ा करने और सिर फोड़वाने. हालांकि कुछ महिलाएं ज़रूर इसके खिलाफ़ हैं और वो यहां से ताड़ी की गद्दी हटाने के लिए संघर्ष करने को भी तैयार हैं. पर एक बार फिर यही लगता है कि जबतक लोग एकजुट होकर इसका विरोध नहीं करेंगे सामुदायिक भवन पर ये क़ब्ज़ा बना ही रहेगा और सार्वजनिक सम्पत्ति का ऐसे ही दुरउपयोग होता रहेगा.

इन दोनों ही सामुदायिक भवनों के बारे में मैं और भी जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा हूं.

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007

बरसात में अनुसूचित जाति मोहल्ला


रामप्रवेश राम

मेरा घर गांव के सबसे आखिर में है. दरअसल यह अनुसूचित जाति का मोहल्ला है. बहुत पहले तो हमारे टोले के बाद कुछ ही घर उंची जाति वालों के थे. पर अब जैसे-जैसे उनका वालों बढ़ रहा है वे लोग और आगे हटकर अपना घर बना रहे हैं. पर हमारे टोले की स्‍थिति वैसी ही है. घरों की संख्या भी ज़्यादा नहीं बढ़ी है. हां दो-चार ईंट के मकान ज़रूर बन गए हैं. वो भी उन्हीं के, जिनके बच्चों ने गांव से निकल कर मेहनत-मज़दूरी की. दो पैसे जमा किए. पर ईंट के मकान दो-चार ही हैं. पर उनमें रहने वाले आज भी शरीर से मेहनत करते हैं, दिल्ली, लुधियाना, जलंधर, मुज़फ़्फ़रपुर जैसे छोटे-बड़े शहरों में रिक्शा खींचते हैं, दुकान में काम करते हैं ...

मेरे घर के आसपास हर साल अषाढ़ से कार्तिक तक वर्षा के कारण जलजमाव रहता है. टोले के लोगों को बहुत परेशानी होती है. मेरे घर से उत्तर दिशा में एक बांध है. हर साल बाढ़ के दिनों में उसके टूटने की आशंका बनी रहती है. कभी-कभी टूट भी जाती है. और जब बांध टूटती है तो हमलोगों को जी-जान लेकर इधर-उधर भागना पड़ता है. मुझे लगता है कि इस बांध को अगर नहीं बांधने दिया होता तो आज ये परेशानी नहीं होती.

हमारे टोले के चारो तरफ़ जलजमाव रहता है. पानी निकलने का कोई रास्ता है ही नहीं. इसके कारण टोले के लोगों खाने-पीने से लेकर स्वास्थ संबंधी बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. डायरिया तो बहुत आम बीमारी होती है बरसात के दिनों में. हर साल बरसात के मौसम में चारो तरफ़ पानी लगे होने के कारण पैदा होने वाली के बीमारी के चलते एक न एक मौत होती है. अकसर बच्चे मौत के शिकार बनते हैं. गांव में एक अस्पताल है. कहने को तो रेफ़रल हॉस्पिटल है, पर उसको देखकर आपको भी डर लगेगा. सुनसान पड़ा रहता है. मैं इसी गांव में रहता हूं पर मुझे भी नहीं मालूम कि डॉक्टर आता भी है कि नहीं. और आता है तो कब आता है. अब ऐसी हालत में साइकिल पर घुम-घुम कर डाक्टरी करने वाले के पास ही हमें भागना पड़ता है.

हमारे मवेशियों के लिए तो ये मौसम और भी तकलीफ़देह होता है. हम लोगों के पास भूसा जमा करने की न जगह है और न ही साधन, जिसके चलते बरसात के मौसम में चारे की कमी के कारण मवेशियों को बहुत तकलीफ़ होती है. बच्चा तो है नहीं कि एक रोटी के टुकड़े से उसका पेट भर जाएगा. ऐसी हालत में कभी किसी की बकरी तो कभी किसी की गाय तो किसी की बाछी की मौत हो जाती है.

हमारे टोले तक आने-जाने के लिए सड़क नहीं है. जिसके चलते शादी-ब्याह के दिनों में बहुत दिक़्क़त होती है. कभी-कभी तो रास्ते के लिए टोले वालों के बीच आपस में झगड़ा भी हो जाता है.

बरसात के दिनों में तो समझिए कि सारे टोले वाले नज़रबंदी की स्थिति में होते हैं. बच्चों का स्कूल आना-जाना भी बंद हो जाता है. कैसे जाएंगे बच्चे स्कूल, इतना पानी होता है चारो ओर कि वो डूब जाएंगे.

दो महीने पहले जब एक रात बांध टूटने का हल्ला हुआ तो हमारे टोले के लोगों ने जो भी अनाज उनाज था उसकी गठरी-मोटरी लेकर उंची जगहों की ओर भागने लगे थे. उन्होंने अपने मवेशियों की रस्सी भी खोल दी थी.

बाढ़ के बाद सरकार की ओर से रिलीफ़ बंटने की घोषणा हुई. कई वार्डों में रिलीफ़ बटे भी. पर हमारे वार्ड के लोग आज भी रिलीफ़ के इंतजार में हैं. उनमें बहुत गुस्सा है. पर क्या करें, मुखिया उनकी बात ही नहीं सुनता है. मैं सफ़र का कार्यकर्ता हूं गांव में. मैंने लोगों को कहा कि एक साथ इकट्ठा होकर चलते हैं सब लोग मुखिया के दरवाज़े पर लेकिन कुछ औरतों के अलावा लोग आगे आने को तैयार ही नहीं हैं. मर्द तो एक भी आगे आने को राजी नहीं हैं. ऐसी हालत में हम दो-चार कार्यकर्ता क्या कर सकते हैं.

सोमवार, 29 अक्टूबर 2007

सामुदायिक भवन

विजय सिंह

मेरे घर के सामने एक मंदिर है. ठीक उस मंदिर के सामने पी डब्‍ल्‍यू डी की सड़क गुज़रती है जो कि शहर की तरफ़ जाती है. तो मंदिर के सामने सड़क पर दस-बारह क़दम चलने के बाद बायीं ओर एक सामुदायिक भवन है. देखने में तो नहीं लगता लेकिन बड़े-बूढ़े बताते हैं कि वह सामुदायिक भवन ही है. फिर मैं सोचता हूं कि जो सामुदायिक भवन हमारे गाँव में बनाया गया है वह किसलिए है. मैं जब भी उस सामुदायिक भवन को देखता हूँ तो सोचने लगता हूँ कि ये जब बना होगा तब किस उपयोग के लिए बना होगा, आज क्या उपयोग हो रहा है उसका.

जिन दिनों ये सामुदायिक भवन अपने गाँव में बनना शुरू हुआ होगा उन दिनों इसके आस-पड़ोस के लोग ये ही सोचते होंगे कि चलो ठीक है अब हमारे यहाँ कोई शादी होगी या कोई सभा या कोई प्रोग्राम करना होगा तो जगह की दिक़्क़त नहीं पड़ेगी. बारात को टिकाने के लिए जगह के बारे में सोचना नहीं होगा. अब तकलीफ़ नहीं होगी. लेकिन यहाँ तो उस सामुदायिक भवन में भैंस, गाय, बैल, बकरी, बांधी जाती है. सामने गोबर के ढेर हैं. कुछ समय पहले इस सामुदायिक भवन में मंदिर के महंथ के बेटे का मुर्गा-पालन का व्यवसाय चल रहा था. क्या इस उपयोग के लिए सरकार ने हमें ये सामुदायिक भवन दिया था? बारातियों की जगह भैंस, बकरी रहेंगे? क्या हमलोग मिलकर इस सामुदायिक भवन को खाली नहीं करा सकते हैं?

गांव के पुराने लोगों से पूछताछ पर पता चला कि जिस ज़मीन पर ये सामुदायिक भवन है वो मंदिर की है. मंदिर हमारे गांव की ही दुर्गा देवी ने बनवाया था. दुर्गा देवी नि:संतान थीं. उन्होंने गांव में मंदिर के अलावा तीन स्कूल भी बनवाए थी. आज उसी के खानदान का एक आदमी न केवल मंदिर का महंथ है बल्कि वह मंदिर की संपत्तियों का जमकर दोहन भी करता है. मंदिर की संपत्ति सरकारी संपत्ति है, लेकिन महंथ को इससे कुछ लेना-देना नहीं है. सुनने में तो ये भी आया है कि उसने कुछ ज़मीनें बेची भी है.

ख़ैर, जब हमने जब सामुदायिक भवन के बारे में पता करना शुरू किया तो गांव वालों से बड़े चौंकाने वाली जानकारी मिली.

पापा कहते हैं कि ये 1988-90 के आस-पास का बना है. जब ये बना था उस वक़्त हमारे गाँव का मुखिया कोई शैलेन्द्र सिंह था. सुनने में आया है कि इस सामुदायिक भवन का टेंडर किसी मोती ठाकुर के नाम मिला था. लेकिन राजपूतों के वर्चस्व वाले इस गांव में मोती ठाकुर जैसे लोहार की क्या हैसियत थी! मंदिर के महंथ ने ही मोती ठाकुर के नाम पर सामुदायिक भवन के निर्माण कार्य को अंजाम दिया. यानि असली ठीकेदार तो महंथ ही था. एक बुजुर्ग ने बताया कभी भी सामुदायिक भवन पूरी तरह से बना ही नहीं. खिड़की-दरवाज़े कभी लगे ही नहीं. प्लास्टर भी नहीं हुआ. आधा-अधूरा सामुदायिक भवन पशुशाला बन गया. कुछ लोगों ने तो कहा कि ये तो चोर-उचक्के का ठिकाना है.

देखा जाए तो हमारे गाँव में अभी पाँच-सात सामुदायिक भवन हैं. लेकिन ऐसा एक भी नहीं है जो वाक़ई समुदाय के काम आ सके. जहां बारात टिकाई जा सके या सभा-गोष्ठी ही की जा सके. क्योंकि सभी सामुदायिक भवन किसी न किसी के कब्ज़े में है. तो फिर क्या फ़ायदा इस सामुदायिक भवन का? जब यह आम जनता के उपयोग में आ ही नहीं रहा है तो क्यों इसको समुदायिक भवन हम कहें?

जिसके नाम से इस सामुदायिक भवन का काम मिला था वो बेचारा तो इस शोक से ही मर गया कि कहीं सरकार ने छान-बीन की तो वो फंस जाएगा. क्योंकि अभी तक वो सामुदायिक भवन का पूरा निर्माण नहीं हुआ वो काम भी अधुरा ही रह गाया और उसका पूरा बिल पास हो गया. ये तो है हमारे गाँव कि सामुदायिक भवन कि कहानी.